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गिद्धों का
कृत्रिम प्रजनन - बीएनएचएस का एक महत्वाकांक्षी प्रकल्प
तेजी से घटनेवाली
गिद्धों की संख्या और उनके संरक्षण प्रकल्प की शुरुवात :
१. भारत में पाए जानेवाले कुल ९ प्रजातियों में से ७ जातीयों की संख्या पिछले
२ दशकों से स्थायी तौर पर कम होती आईं
हैं।
२. लगभग १९९० की दशक में केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में गिद्धों की संख्या
में हुई ह्रास का पता बीएनएचएस के वैज्ञानिकों
ने लगाया ।
३. वन और पर्यावरण मंत्रालय, यू.एस. फ़िश अँड वाइल्डलाइफ़ सर्विसेस और अन्य
संस्थाओं की
मदद से बीएनएचएस के
वैज्ञानिकोंने गिद्धोंके ८ प्रजातीओं की
लगातार निगरानी की ।
४. २००४ में प्रकाशित किए गए अनुसंधान में ऐसा निष्कर्ष निकाला गया कि
जानवरों को दिए जानेवाले डायक्लोफ़िनॅक
नामक पीडाहारी औषधी के कारण गिद्धों
पर विपरीत असर हो रहा है ।
गिद्धोंपर किए जाने वाले वैज्ञानिक अनुसंधान:
१. ‘जिप्स’ प्रजाती के गिद्धों के घोंसलों की गिनती करना ।
२. स्वयंसेवकों की मदद से गिद्धों के वसतीस्थानों का अवलोकन करना ।
३. शीत ॠतु में गिद्धों का सर्वेक्षण ।
४. डायक्लोफ़िनॅक औषधी का विकल्प माने जाने वाले मेलॉक्सिकॅम नामक औषधी
की निर्भतापर अभ्यास करना.
भारत के गिद्ध कृत्रिम प्रजनन केंद्र:
१. पिंजोर, हरयाना
२. राजाभातखावा, पश्चिम बंगाल
३. राणी, आसाम
अर्थ सहाय्यक:
वन और पर्यावरण मंत्रालय, हरयाना वन विभाग, डार्विन इनिशिएटिव, रॉयल सोसायटी
फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ बर्डस (आर.एस.पी.बी.), झूलॉजिकल सर्वे ऑफ़ लंडन, नॅशनल
बर्डस ऑफ़ प्रे, ट्रस्ट.
संपर्क:
डॉ. विभू प्रकाश (मुख्य संचालक)
कार्यालय: बी-३, फ़ॉरेस्ट कँप्लेक्स,
पिंजोर
- १३४१०२, हरयाना
भ्रमणध्वनी: ०१७३३-२३२९२४, २४०३०४
घर:
एफ़-२३, एचएमटी कॉलनी
पिंजोर
- १३४१०१, हरयाना
भ्रमणध्वनी: ०१७३३-३६४४२६, ०९८१६०७६४६९
ई-मेल:
jatayuprakash@sify.com
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